करीब १२ वर्षों में विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस के सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पिछले कुछ महीनों में पहली बार नरेन्द्र मोदी के लिए गंभीर रूप से राजनीतिक चुनौती बन कर उभरे हैं | ऐसे में यह समझना बहुत आवश्यक है कि आखिर राहुल गाँधी की रणनीति क्या है और वो किस कारण इतने आक्रामक दिख रहे हैं और क्या वास्तव में उन्हें उस स्तर की सफलता मिल सकेगी जिसका उनकी ओर से दावा किया जा रहा है |
विपक्ष के नेता राहुल गांधी अपने पूरे पोलिटिकल करियर में अपने मुद्दे लगातार बदलते रहते हैं और किसी भी एक मुद्दे पर लम्बे समय तक टिक नहीं पाते, शायद यह उनकी राजनीतिक रणनीति है जिसमें पहली बार उनकी चर्चा होने लगी है | राहुल गांधी जब स्वयं रिमोट कंट्रोल से मनमोहन सिंह की सरकार चला रहे थे तब भी उन्होंने देश की राजनीति में वामपंथी और व्यवस्था विरोधी असंतोष का सामाजिक और राजनीतिक स्पेस घेर रखा था | मनमोहन सिंह को उदारवादी अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी राजनीतिक चेहरे के रूप में देश के सामने प्रस्तुत किया गया था , ताकि देश का मध्य वर्ग और कुलीन वर्ग कांग्रेस की सत्ता का सहयोग करे पंरतु दूसरी ओर स्वयं राहुल गांधी एक वामपंथी और व्यवस्था विरोधी असंतोष के चेहरे के रूप में देश के सामने आते थे और उन मुद्दों के नायक के रूप में सामने आते थे जो उन्हें व्यवस्था से लड़ने वाले नेता के रूप में सामने लाता था |
भट्टा परसौल में मोटर साईकिल पर बैठकर गाँव में पहुंचकर किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले जुझारू नेता की छवि से आरम्भ हुआ उनका यह अभियान अब तक दो दशक की यात्रा पार करते हुए अनगिनत बार राहुल गांधी की छवि को निखारने के लिए नए नए मुद्दों के साथ जुड़ता रहा है|
राहुल गांधी की राजनीति अब सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को चुनावी रूप में चुनौतीपूर्ण नहीं दिखती ,लेकिन राहुल गांधी जिस प्रकार लगातार व्यवस्था विरोधी असंतोष की कम्युनिष्ट माडल की राजनीति को बढ़ावा देते हैं , उसके चलते उनकी एक मंशा स्पष्ट हो रही है कि बदलती हुई स्थिति में बहुत से परिवर्तन को राहुल गांधी ने भांप लिया है|
पिछले १२ वर्षों में पहली बार दुनिया कि राजनीति में वामपंथी उभर देखने को मिल रहा है , इसलिए राहुल गाँधी १९६० के दशक वाली इंदिरा गांधी की रणनीति पर कम कर रहे हैं और कम्युनिष्ट , वामपंथी , सोशलिस्ट , इस्लामवादी और चर्च की शक्तियों के सहयोगी के रूप में स्वयं को दिखा रहे है| इंदिरा गांधी और राहुल गांधी के युग में एक बड़ा अंतर सोशल मीडिया का है |
सोशल मीडिया ने बीते एक डेढ़ दशक में न केवल राजनीति बल्कि सामाजिक ताने बाने को प्रभावित किया है और दुनिया के अनेक देशों में सोशल मीडिया के माध्यम से आंतरिक उपद्रव भी हुए हैं और सत्ता परिवर्तन भी हुए हैं |
राहुल गांधी भले ही भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी को चुनाव की राजनीति में पराजित नहीं कर पा रहे हैं , पंरतु उनकी रणनीति का प्रमुख केंद्रबिंदु यह बन गया है कि भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा और उसके प्रति समाज में उपजे विश्वास के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा किया जाये और विशेष रूप से नयी पीढी के अन्दर और समाज के हर उस वर्ग के मन में भ्रम और अविश्वास पैदा किया जाए जो भाजपा को समर्थन देता है और धीरे धीरे लोग पहले भाजपा का उपहास करेंगे , फिर आलोचना करेंगे , फिर विरोध करेंगे और फिर इस स्तर तक विरोध करेंगे कि भाजपा के अतिरिक्त कोई भी चलेगा |
भारतीय जनता पार्टी ने २०१४ में जब एक नया समीकरण बनाकर सता प्राप्त की तो वह भारतीय राजनीति के लिए बिलकुल नया प्रयोग था |
१९८० में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से भारतीय जनता पार्टीं को भौगोलिक और सामाजिक रूप से एक सीमित जनाधार की पार्टी के रूप में देखा जा रहा था | यहाँ तक कि राम मंदिर आन्दोलन के दौरान १९८९ से लेकर १९९८ के सफ़र दौर में जब १९९६ और १९९८ में भारतीय जनता पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई तब भी विपक्ष की ओर से भारतीय जनता पार्टी और उसके हिंदुत्व विचार परिवार पर यही आरोप लगता रहा कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे राजनीतिक और सामाजिक भाषा में दलित, पिछड़े और आदिवासी की संज्ञा दी जाती है ,उसे भारतीय जनता पार्टी और उसके हिंदुत्व विचार परिवार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है|
२०१४ में नरेन्द्र मोदी ने जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार का नेतृत्व अपने हाथों में लिया तो उन्होंने एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन किया कि उन वर्गों को भारतीय जनता पार्टी में वास्तविक प्रतिनिधित्व दिखे जिन वर्गों तक अभी तक भारतीय जनता पार्टी नहीं पहुँच पाई थी | हालांकि इसके पीछे चेहरा नरेन्द्र मोदी का था परन्तु पूरे विचार परिवार के इको सिस्टम में यह सामाजिक परिवर्तन हुआ |
भारतीय जनता पार्टी ने बीते एक दशक से अधिक समय में दलित , पिछड़े और आदिवासी वर्गों में भारतीय जनता पार्टी का सामाजिक और राजनीतिक विस्तार किया है और इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव दर चुनाव अपनी रणनीति बदलने वाले राहुल गांधी को बीते लोकसभा चुनावों में २०२४ में संविधान पर ख़तरा है जैसा नैरेटिव चलाकर दलित और पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ने का प्रयास करना पडा |
राहुल गांधी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग रणनीति के साथ काम करते हैं | २०१८ में उन्होंने मध्य प्रदेश, राजस्थान , छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों के लिए स्वयं को जनेऊधारी सनातनी हिन्दू के रूप में प्रस्तुत किया , मदिरों में पूजा की और इन राज्यों में धार्मिक रूप से लोगों को भावनात्मक स्तर पर साथ जोड़ा , लेकिन जब २०१९ में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी को राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर चौकीदार चोर है का नारा लगाया और इसके सहारे लोकसभा चुनाव जीतना चाहा तो उनकी इस रणनीति के चलते कांग्रेस उस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार गयी और राहुल गांधी स्वयं अपनी खानदानी सीट अमेठी से चुनाव हार गए और उन्होंने अपने लिए दूसरी सुरक्षित सीट केरल के वायनाड में चुनी जहां से वो अच्छे मतों से चुनाव जीत गए | लेकिन अमेठी में राहुल गांधी की हार और लोकसभा चुनावों में उनकी कांग्रेस पार्टी की हार का यह असर हुआ कि राहुल गांधी ने स्वयं को जनेऊधारी सनातनी हिन्दू कहना छोड़ दिया और कांग्रेस की परम्परागत सेक्युलर राजनीति की ओर गए और मुस्लिम दलित गठबंधन के नए प्रयोग आरम्भ कर दिए |
२०१४ में केंद्र में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही कांग्रेस और राहुल गांधी को यह आभास हो गया था कि हिंदुत्व के विचार के अंतर्गत जातियों का एकत्रीकरण ही भारतीय जनता पार्टी की शक्ति है इसलिए कांग्रेस ने उन प्रमुख राज्यों में विभिन्न जातियों के आन्दोलन को उकसाना आरम्भ किया जो उन राज्यों की मजबूत और शक्तिशाली जातियां हैं | गुजरात में पटेल , हरियाणा में जाट , राजस्थान में गुर्जर और राजपूत , महाराष्ट्र में मराठा , कर्नाटक में लिंगायत अदि और इनका कांग्रेस को लाभ भी मिलता रहा|
२०१४ से २०१९ के मध्य कांग्रेस ने अनेक राज्यों में आरक्षण की मांग सहित अनेक मांगों के साथ उन राज्यों की मजबूत जातियों के आन्दोलन का साथ दिया और इन आंदोलनों के निशाने पर भारतीय जनता पार्टी ही रही |
२०१८ में मध्य प्रदेश , राजस्थान , छतीसगढ़ में सामान्य बनाम पिछड़ा -दलित के नैरेटिव को हवा देकर राहुल गांधी ने बड़ी चालाकी से स्वयं को जनेऊधारी सनातनी हिन्दू बताकर कांग्रेस को सत्ता दिला दी | लेकिन २०१९ के लोकसभा चुनाव में अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने दक्षिण भारत और महाराष्ट्र पर अपना ध्यान केन्द्रित किया | महाराष्ट्र में हिंदुत्व के विचार वाली शिवसेना को उन्होंने अपने सेक्युलर गठबंधन का हिस्सा बना लिया और दक्षिण भारत में केरल, तेलंगाना , कर्नाटक और तमिलनाडु के आक्सीजन के सहारे उन्होंने कांग्रेस की परम्परागत सेक्युलर राजनीति को मजबूत किया |
२०१९ से २०२४ के लोकसभा चुनावों तक राहुल गांधी ने दलित – मुस्लिम गठबंधन के राजनीतिक नैरेटिव को खूब प्रचारित कराया , देश में वामपंथी और अर्बन नक्सल इको सिस्टम ने उन्हें काफी सहयोग किया | देश भर में दलित मुस्लिम उत्पीडन के व्यापक विमर्श के साथ २०२४ के लोकसभा चुनावों में संविधान खतरे में है के नारे से कांग्रेस उत्तर भारत, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में अपना प्रदर्शन सुधारने में सफल रही |
२०२४ के लोकसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी को यह आभास हुआ कि शायद देश में पिछड़ा वर्ग नरेन्द्र मोदी के समर्थन में है इसलिए भारतीय जनता पार्टी को सफलता मिलती है , इसलिए उन्होंने जातीय जनगणना और पिछड़ा को उसके आबादी के हिसाब से सामाजिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व की बात उठायी , लेकिन जब राहुल गांधी को आभास हुआ कि देश भर में पिछड़ा वर्ग कोई Homogenous या यूनिफार्म वर्ग नहीं है और उसमें भी बहुत उपवर्गीकरण है और उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में पिछड़ा वर्ग की अवधारणा और सामाजिक स्थिति में बहुत अंतर है तो उन्होंने बिहार चुनाव के दौरान जातीय जनगणना और दलित पिछड़ा के अधिकार की बात को पलटकर चुनाव आयोग को निशाने पर लेकर देश की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करने शुरू किये |
यह परिवर्तन राहुल गांधी की रणनीति में इसलिए आया है कि उन्होंने पिछले वर्ष भारत के पड़ोसी देशों में सोशल मीडिया के माध्यम से हुए उथल पुथल से देश में हुए सत्ता परिवर्तन को देखा है , इसलिए राहुल गांधी देश की जनता के मन में भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के प्रति अविश्वास पैदा करना चाहते हैं और इसके लिए दशकों से भारतीय जनता पार्टी के समर्थक रहे सामाजिक वर्ग को गुस्सा दिलाया जा रहा है और दूसरी ओर जिस नैरेटिव के सहारे भारतीय जनता पार्टी का सामाजिक और राजनीतिक विस्तार हुआ है उसे निशाना बनाया जा रहा है , हिंदुत्व बनाम जाति और देश में संवैधानिक संस्थानों और लोकतान्त्रिक ढांचे के खतरे का विचार प्रचारित कर भाजपा और उसके वैचारिक सहयोगियों के विरुद्ध एक व्यापक असंतोष का भाव समाज में निर्माण करना |
२००४ से २०१४ के बीच जब यूपीए के सरकार थी तो बड़े पैमाने पर देश भर में गैर सरकारी संगठनों का जाल फैलाया गया जो एक इशारे पर राहुल गांधी के नैरेटिव पर सक्रिय हो जाते हैं और उनका लक्ष्य ऐसे मुद्दों को उठाते हुए एक दिन देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न करना है|
इसका मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी और उसके हिंदुत्व विचार परिवार को अधिक रिसर्च और अध्ययन के साथ सक्रिय होना होगा क्योंकि मैंने इस बात को अनुभव किया है कि जैसे ही देश में कोई विवाद खड़ा होता है , सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में ऐसे हैंडल हैं जो अपना नाम और पहचान बदलकर उन मुद्दों के साथ खड़े होकर समाज को उकसाने और भडकाने का काम आरम्भ कर देते हैं | चाहे CAA का मुद्दा हो, किसान आन्दोलन हो या अब यूजीसी का मुद्दा हो, ऐसे सोशल मीडिया हैंडल उन मुद्दों के प्रति सहानुभूति रखने वाले बनकर सक्रिय हो जाते हैं और फिर मुद्दे के तथ्य और असली बहस का स्थान भ्रामक बहस ले लेती है जिसका अंतिम परिणाम इन मुद्दों को उठाने वालों के भीतर लोगों को घुसाकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न करन होता है और यह सब इतना महीन ढंग से होता है कि मुद्दा कब हाईजैक हो जाता है बेचारे मुद्दा उठाने वाले भी नहीं समझ पाते और इस पूरी बहस और अभियान में एक भ्रम और नैरेटिव बदल जाने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है| इस समय ऐसा ही यूजीसी मुद्दे और तथाकथित सामान्य वर्ग के अधिकार के नाम पर हो रहा है | यूजीसी के मुद्दे पर अपनी वास्तविक चिन्ताओं से आरम्भ हुआ यह अभियान अब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा उपयोग किया जाने लगा है ताकि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इसका राजनीतिक नुकसान भाजपा को हो सके |
२०१४ में नरेन्द्र मोदी की सफलता का बड़ा कारण सोशल मीडिया ही था पंरतु अब सोशल मीडिया का नैरेटिव का स्पेस पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी और उसके इको सिस्टम के हाथ में नहीं है और इसे फ्री लांसर ने अपने हाथ में ले लिया है जिनका अपना कोई एजेंडा नहीं होता लेकिन इनकी फोलोविंग बहुत होती है और कांग्रेस इको सिस्टम को बहुत अच्छे से पता है कि इनका मनोवैज्ञानिक प्रयोग अपने हितों में और भाजपा के विरुद्ध कैसे करना है | यूजीसी मुद्दे के बहाने उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है |
यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जो राहुल गांधी वर्षों से दलित पिछड़े की बात कर रहे थे उन्होंने यूजीसी पर उठे विवाद में दलित पिछड़े का साथ नहीं दिया और उनका इको सिस्टम भी चुप रहा क्यों ? इसलिए कि आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक समीकरण दलित – मुस्लिम और सामान्य वर्ग को अपने साथ लाना चाहती है , उन्हें पता है कि पीडीए के फार्मूले के तहत पिछड़ा वर्ग का बड़ा तबका समाजवादी पार्टी के साथ रहेगा और यदि कांग्रेस दलित – मुस्लिम – सामान्य वर्ग को साथ ले आये तो भारतीय जनता पार्टी का हिंदुत्व का किला ढह जाएगा , इसीलिये राहुल गांधी और कांग्रेस यूजीसी के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश में सामान्य वर्ग को नरेन्द्र मोदी के खिलाफ भडका रही है , जितना इस भ्रम में लोग आते जा रहे हैं उतना ही कांग्रेस की रणनीति सफल हो रही है | यह सब इतने महीन ढंग से हो रहा है कि कोई इसे समझ भी नहीं पा रहा है |
बीते कुछ महीनों में भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह रक्षात्मक मुद्रा में आ गयी है और राहुल गाँधी के मुद्दों में उलझती जा रही है | जैसे राहुल गाँधी ने लोकसभा चुनावों के दौरान संविधान और आरक्षण पर खतरे की बात की, फिर पिछड़े वर्ग के लिए जातिगत जनगणना की बात की | भारतीय जनता पार्टी ने इसकी प्रतिक्रिया में हिंदुत्व के रास्ते में सामाजिक न्याय को भी शामिल करना चाहा और इसने भाजपा के हिंदुत्व के अभियान में जातिगत टकराव के लिए स्पेस खड़ा कर दिया | आज उत्तर भारतीय राज्यों में यूजीसी नियम के लिए चल रही बहस में भाजपा को उलझना पड़ रहा है और यही राहुल गाँधी की रणनीति है कि भाजपा हिंदुत्व के बजाय जाति की बात करने लगे |
राहुल गाँधी की रणनीति केवल मुद्दे बदलकर भाजपा को उलझाना और उसके हिंदुत्व और विचारधारा के दायरे से बाहर निकालना है , अब देखना है भाजपा और उसके वैचारिक सहयोगी राहुल गांधी की इस रणनीति का सामना कैसे करते हैं ?
सोशल मीडिया के इस दौर में सारी लड़ाई विचार और अफवाह की बीच हो चुकी है| भारतीय जनता पार्टी ने भले ही अपने कार्यकर्ताओं का बड़ा ढांचा खड़ा कर लिया हो और उसकी इलेक्शन मशीनरी बहुत मजबूत है लेकिन यदि भाजपा और उनके हिंदुत्व विचार परिवार के लोगों को मनोवैज्ञानिक वैचारिक लड़ाई का प्रशिक्षण नहीं दिया गया तो देखते देखते बाजी राहुल गांधी के हाथों में चली जायेगी और भाजपा उनके राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस जायेगी |

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