भारत एक ऐसा देश है जहाँ कि राजनीतिक वर्ग के लोग और बौद्धिक वर्ग के लोग स्वयं पर विश्वास खो चुके हैं और आयातित शब्दों पर अधिक भरोसा करते हैं। इस देश में अनेक वाद आयातित किये गये हैं परंतु जिस वाद ने हमारे समाज को और राजनीति को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है वह है “सेक्युलरिज्म”। सेक्युलरिज्म के नाम पर देश में कोई भी सामाजिक और राजनीतिक अपराध ढका जा सकता है।
इसी सेक्युलरिज्म के नाम पर देश में कितने ही राजनीतिक पाप हुए हैं परंतु कोई भी सेक्युलरिज्म पर बहस खडा करने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि यह अपनी अवधारणा के साथ इतना शक्तिशाली है कि यह प्रश्न उठाने वाले को ही कटघरे में खडा कर देता है।
वैसे तो सेक्युलरिज्म हमारे संविधान की सबसे पवित्र अवधारणा है और इसी कारण बौद्धिक वर्ग से लेकर राजनीतिक वर्ग तक इस पर बहस करने से कतराते हैं। परंतु यह भी सत्य है कि जैसे जैसे हम अपनी राष्ट्रीयता के मामले में परा आधुनिक युग की ओर बढ रहे हैं उसी अनुपात में हम सेक्युलरिज्म के मामले में पूरी तरह अतार्किक और अन्धविश्वास होकर अंधयुग में प्रवेश कर गये हैं।
प्रख्यात संत और आध्यात्मिक विभूति स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी देशों में अपने आध्यात्मिक प्रवचनों और व्याख्यान में तत्कालीन तर्कवादियों पर कटाक्ष करते हुए प्रायः दुहराया था कि जो लोग तर्क के नाम पर धर्म और परम्परा का उपहास करते हैं उन्हें यह समझना चाहिये कि यदि धर्म और परम्परा का अंधानुकरण अंधविश्वास है तो विज्ञान और तर्क के नाम पर उसका अंधानुकरण भी अंधविश्वास है जिसे कि अभी अनेक कसौटियों पर खरा उतरना है।
देश में आज सेक्युलरिज्म की पूरी बहस में स्वामी विवेकानन्द का यह प्रसंग अत्यंत प्रासंगिक है। वर्तमान समय में देश में सेक्युलरिज्म के प्रति बौद्धिक और राजनीतिक समाज का रुख देखकर मुझे अपने बाल्यकाल का वह समय स्मरण हो आता है जब बौद्धिक समाज की बहस का आधार यह होता था कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। नास्तिक, उदारवादी और कम्युनिस्ट प्रायः परम्परावादियों का उपहास करते थे और उन्हें अपना जीवन यही सिद्ध करने में लगा देना पडा कि ईश्वर जैसी कोई चीज है। साथ ही अपने बाल्यकाल में मैंने यह भी पाया था कि यह पूरी बहस बेमानी थी और इसमें विचारधारा से अधिक राजनीतिक मायने होते थे।
अपने ग्रेजुयेशन काल में मेरे हिंदी के प्रोफेसर नास्तिक और कम्युनिस्ट होने का ढोंग करते थे पर उनका पूरा परिवार सत्यनारायण की कथा और अखंड रामायण का पाठ करता था। उन्होंने यह बाना इसलिये बनाया था क्योंकि अन्य प्रोफेसर परम्परावादी थे और उनके लिये कोई राजनीतिक धरातल वहाँ था नहीं।
मैं ये बातें यहाँ जानबूझकर ला रहा हूँ क्योंकि आज की राजनीति में हमारा देश कम्युनिज्म के फासीवाद की भाँति सेक्युलर फासीवाद की ओर जा रहा है। जिस प्रकार कम्युनिज्म में वर्ग संघर्ष के नाम पर लाखों लोगों ही हत्याओं को न्यायसंगत ठहराया गया और लोगों को अपनी ही सरकारों ने मरवाया उसी प्रकार फासीवाद और नाजीवाद के चलते भी एकाँगी विचारधारा के नाम पर विरोधी विचार को कुचला गया ।
इसी प्रकार हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ कि उदारवादी वामपंथ और सेक्युलरिज्म के नाम पर फासीवाद को अपनाया जा रहा है और इसके तहत नये विचार और दृष्टि को व्यवस्था और समाज पर थोपा जा रहा है। जिस प्रकार कम्युनिज्म और फासीवाद में एक विश्वव्यवस्था के अनुरूप संस्थाओं को ढालने का प्रयास किया जाता था और जो इसमें बाधा बनता था उसे रास्ते से हटा दिया जाता था वही कुछ उदारवाद और सेक्युलरिज्म के नाम पर हो रहा है।
वैसे तो समस्त विश्व में यह प्रवृत्ति बढ रही है परंतु भारत में विशेष रूप से यह प्रयोग चल रहा है।
वर्तमान संप्रग सरकार के नौ वर्षों के शासनकाल में देश लगभग सेक्युलर फासीवाद में प्रवेश कर चुका है।
भारत के संविधान ने शासन के लिये कुछ व्यस्था प्रदान की है जहाँ की प्रधानमंत्री को कैबिनेट का प्रमुख बनाया गया है जो कि अपने कैबिनेट के माध्यम से देश की जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। परंतु वर्तमान सरकार के दो कार्यकाल में इस व्यवस्था को तोडा जा रहा है। प्रधानमंत्री का चुनाव जनता नहीं कर रही है और प्रधानमंत्री की कैबिनेट से परे एक प्रच्छन्न कैबिनेट राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के रूप में कार्य कर रही है जो किसी के प्रति भी उत्तरदायी नहीं है परंतु न केवल कानून का ड्राफ्ट तैयार करती है वरन अनेक वामपंथी रुझान के लोगों और गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से देश में जनमत बदलने और अपने विचारों को बदलने के लिये समानांतर संस्थान खडे करती है।
बीते नौ वर्षों मे न केवल वर्तमान सरकार ने संवैधानिक संस्थानों को कमजोर किया है वरन बौद्धिक वर्ग को अन्यान का साथ देने को विवश किया है और यह सब कुछ सेक्युलरिज्म के नाम पर हो रहा है।
सेक्युलरिज्म की यह पूरी बहस एकाँगी हो गयी है और इसके बहाने उदारवादी वामपंथ का एजेंडा आगे बढाया जा रहा है।
अपने नौ वर्षों के शासन काल में वर्तमान सरकार ने अल्पसंख्यकों या आतंकवाद की समस्या के समाधान का कोई प्रयास नहीं किया वरन इसे और हवा देते हुए इसके प्रति अनेक अवधारणायें विकसित कीं कि इस समुदाय के साथ अन्याय होता है इसे विशेष अधिकार मिलने चाहिये आदि।
आज तो स्थिति ऐसी हो गयी है कि न्याय के नाम पर खुले आम अन्याय हो रहा है और पूरी व्यवस्था एकाँगी होती जा रही है।
जिस प्रकार हिटलर ने कम्युनिज्म का भय दिखाकर फासीवास को आगे बढाया था उसी प्रकार आज साम्प्रदायिकता से लड्ने के नाम पर हमारा समस्त राजनीतिक वर्ग सेक्युलर फासीवाद के जाल में उलझ रहा है। यही कुछ स्टालिन और माओ ने वर्ग संघर्ष और सामाजिक समानता के नाम पर किया था।
आज हम इतिहास को दुहराते दिख रहे हैं वर्तमान सरकार 2002 के गुजरात दंगों का बहाना लेकर संवैधानिक संस्थाओं को तोडने मरोडने से लेकर सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग तक सभी कुछ कर रही है और राजनेता अपने कथित स्वार्थ के चलते यह सब होने दे रहे हैं। उन्हें समझना चाहिये कि ऐसे किसी भी षडयन्त्र का हिस्सा बन कर वे अपना और देश दोनों का नुकसान कर रहे हैं।
कुछ वर्ष पूर्व हमारे प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अल्पसंख्यकों का देश के संसाधनों पर पहला अधिकार है।
इसके बाद आतंक से लड्ने के स्थान पर उसे इस्लामी और भगवा आतंक में विभाजित कर दिया गया।
देश में आतंक के आरोप में पकडे गये अल्पसंख्यकों के लिये अलग से अदालतें गठित करने का प्रस्ताव लाया गया।
यही नहीं सेक्युलर फासीवाद को आगे बढाने के लिये न्यायपालिका के समानांतर एक नयी व्यवस्था सी खडी कर प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश ने 1993 के मुम्बई हमलों में दोषियों की क्षमा की गुहार लगाकर उन्हें माफी दिलाने का जिम्मा उठा लिया और उनमें से अधिकाँश को कुछ राहत दिला भी दी है।
आज हमारे बौद्धिक समाज , राजनीतिक समाज और मीडिया के लोगों के सामने यह समझने की चुनौती है कि जिस व्यवस्था को हमने पिछले 6 दशक में खडा किया है उसे साम्प्रदायिकता से लड्ने के नाम पर ध्वस्त करने का प्रयास हो रहा है। देश को साम्प्रदायिकता से नहीं सेक्युलर फासीवाद से खतरा है। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाये और हमें प्रायश्चित करने का अवसर भी न मिले।
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